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तुम से कुछ दो शब्द कहूँ ...

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हे चाँद, मित्र मेरे !

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हे चाँद, मित्र मेरे !


हे चाँद ! कितना कोमल है

तुम्हारा रंग-रूप

कितना सौम्य हो तुम अपने आप में

कितनी शीतल है तुम्हारी आत्मा

तुम्हारी चमक, तुम्हारी काया

तुम्हारी परछाई, तुम्हारा आस-पास

यहाँ तक कि तुम्हारा अंग-अंग |


तुम केवल कोमल ही नहीं

शक्ति का स्वरुप हो

तीव्र हो, दिव्य हो

ज्योति के अदभुत रूप

संगी हो आकाश के

धरती का वियोग हो

कभी लुप्त हो, कभी क्षुब्ध हो

कभी सितारों के श्रृंगार |


हे चाँद ! जब कभी दृष्टि मेरी

तुम्हारे आकाश पर पड़ती है

मैं सवालों के कटघरे में

आ जाती हूँ यह सोच कर

कि सह लेते हो कैसे तुम

सूरज की क्रूर रोशनी

और कैसे घटते-बढ़ते हो

उसकी छात्रछाया में |


क्या तुम्हारा विश्वास

उसकी कठोरता से

थोड़ा भी डगमगाता नहीं

क्या तुम्हारा मन क्रूर किरणों से

कभी विचलित होता नहीं

आखिर, कैसे सह लेते हो

यह सब कुछ

और पी लेते हो

अपने आँसुओं को

कैसे ढक लेते हो

अपनी असहनीय पीड़ा

और मुस्कुराते रहते हो

सारी रात, सारी उम्र !


तुम्हारी इस महानता को देख

मैं निहारती हूँ तुम्हारी छवि

तुम्हारे हर एक दिन

और हर एक कदम

और हर पूर्णिमा की रात

निहारती हूँ तुम्हें जी भर कर

आँखें टिक जाती हैं

सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम पर

और फिर से खो जाती हूँ

तुम्हारे असीम आकाश में

देखकर तुम्हारा रंग-रूप

तुम्हारी कोमलता, तुम्हारी शीतलता

तुम्हारी आत्मा, तुम्हारी सौम्यता,

तुम्हारी चमक, तुम्हारी काया,

तुम्हारी परछाई, तुम्हारा आस-पास

और तुम्हारा कभी ना दिखने वाला

वह चेहरा जिसे मैंने महसूस किया है

बहुत करीब से मित्र मेरे !


–  धवलिमा भीष्मबाला

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 9, 2012

स्वागत है, बहुत बढ़िया भाव. मेरा प्रिय चंदा. बधाई.

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 11, 2012

    आदरणीय प्रदीप सर जी, बहुत-बहुत धन्यवाद |

yamunapathak के द्वारा
October 5, 2012

आप बहुत सुन्दर भावों की रचना लिखती हैं.

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 6, 2012

    आदरणीय यमुना मैम जी, सराहना केलिए हार्दिक धन्यवाद |

yogi sarswat के द्वारा
September 25, 2012

तुम केवल कोमल ही नहीं शक्ति का स्वरुप हो तीव्र हो, दिव्य हो ज्योति के अदभुत रूप संगी हो आकाश के धरती का वियोग हो कभी लुप्त हो, कभी क्षुब्ध हो कभी सितारों के श्रृंगार | स्वागत है आपका ! और शुरुआत ही बहुत सुन्दर शब्दों से करी है आपने , आशा कर सकता हूँ आपका सफ़र इस मंच पर हमेशा ही शानदार रहेगा ! और आपका लेखन हमें लगातार पढने को मिलेगा

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 4, 2012

    योगेश जी, बहुत -बहुत धन्यवाद |

September 24, 2012

गजब.. :-)

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 4, 2012

    धन्यवाद जौनेत जी|

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 24, 2012

आदरणीया धवलिमा जी …खूबसूरत ….शीतल मोहक चंदा का ये रूप निखर गया ….सुन्दर सन्देश ..सुन्दर शब्द विन्यास क्या तुम्हारा मन क्रूर किरणों से कभी विचलित होता नहीं आखिर, कैसे सह लेते हो यह सब कुछ और पी लेते हो अपने आँसुओं को कैसे ढक लेते हो अपनी असहनीय पीड़ा और मुस्कुराते रहते हो सारी रात, सारी उम्र ! सीख लेने की जरुरत है इनसे हम सब को भी …इसीलिए तो ये कभी मामा हैं कभी चंदा कभी उनके चाँद तो कभी चांदनी …. भ्रमर 5

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 4, 2012

    आदरणीय सुरेन्द्र जी,बहुत -बहुत धन्यवाद |

ashishgonda के द्वारा
September 24, 2012

माननीया बहनजी! चाँद पर लिखी गई बहुत ही सुन्दर कविता को पढकर मन बाग-बाग हो गया. कभी मेरे लिए भी समय निकाले. http://ashishgonda.jagranjunction.com/2012/09/20/%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%97-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%AF%E0%A4%BE/

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    September 24, 2012

    आदरणीय आशीष जी, बहुत-बहुत धन्यवाद |

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 4, 2012

    आशीष जी, इस कविता की सराहना केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद,अवश्य ही मैं आपके लेख को पढूंगी|

akraktale के द्वारा
September 21, 2012

धवालिमा जी सादर, रचना बहुत ही सुन्दर है.किन्तु सूर्य और चन्द्र पर लिखी पंक्तियों कि कल्पना का समर्थन नहीं कर सकता. लिखती रहें और तथ्यों से सामंजस्य बैठा कर लिखें. बधाई स्वीकारें.

    shashibhushan1959 के द्वारा
    September 24, 2012

    आदरणीय धवलिमा जी, सादर ! आदरणीय मुनीश जी की बातों से सहमति ! आपकी भावनाएं सराहनीय !

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    September 24, 2012

    आदरणीय रक्ताले जी, मार्गदर्शन और सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद |

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 4, 2012

आदरणीय शशीभूषण जी,बहुत बहुत धन्यवाद |


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