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तुम से कुछ दो शब्द कहूँ ...

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तेरे होठों पे आना चाहती हूँ

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तेरे होठों पे आना चाहती हूँ


ना गैरों से ना अपनों से

शिकवा और शिकायत है

अपने दुःख को अपने सुख को

प्रीत बनाना चाहती हूँ

हृदय उड़ेल मनोव्यथा को

कागज़ पर लिखना चाहती हूँ

अपने हाथों अपनी किस्मत की

नई लकीर खींचना चाहती हूँ |


गा सकूँ मैं अपना राग

अपने मन के आँगन में

आँख मूँद कर शांत भाव से

मग्न हो उठूँ खुद में ही

और साँझ का सूरज बन कर

मैं डूबूँ गहरे सागर में

ऐसी ही कुछ तस्वीरों से

एक गीत बनाना चाहती हूँ |


सरस्वती की मूरत बन कर

और हाथों में वीणा लेकर

ज्ञान स्वरूपा विद्या को

अपने भीतर लाना चाहती हूँ

सुर की नदिया में बहकर

कठोर शब्द की वाणी तोड़

प्रेम-भाव के तारों को गढ़

मधुर संगीत बनाना चाहती हूँ |


ना बसंत ऋतु की गुलशन हूँ

ना फागुन की पतझड़

सूखे पत्तों-सा उड़ –उड़ कर

ना ठण्ड भरी वादियों की सिकुड़न

हाँ ! जल-जल बुझना चाहती हूँ

सहनशीलता के दीपक में

कुंदन-सा मुखमंडल लेकर

बाती बनकर अँधियारे को

रोशन करना चाहती हूँ |


चहार दीवारी में महफूज़ सही

पर खतरों से लड़-टकरा कर

अब आईने के सामने

मैं दुनिया के मंच पर

दस्तक देना चाहती हूँ

जो तन्हाई में कहती थी

और तन्हाई ही सुनती थी

अब ऐसी ख़ामोशी तोड़

महफ़िल में आना चाहती हूँ |


तस्वीर ये मेरे चेहरे की

कभी तो मानो ढल सकती है

पर इन वेदनाओं की छोटी इच्छा

पूर्ण कभी ना हो सकती है

मुझे पढ़ कर अपने नयन से

मन तृप्त मेरा तू कर देना

इसीलिए मैं कविता बनकर

तेरे होंठों पे आना चाहती हूँ |


–धवालिमा भीष्मबाला

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33 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aman kumar के द्वारा
February 25, 2013

तस्वीर ये मेरे चेहरे की कभी तो मानो ढल सकती है पर इन वेदनाओं की छोटी इच्छा पूर्ण कभी ना हो सकती है मुझे पढ़ कर अपने नयन से मन तृप्त मेरा तू कर देना इसीलिए मैं कविता बनकर तेरे होंठों पे आना चाहती हूँ | दिल को छु लिया मानो ………. अति सुंदर अति सुंदर १

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    February 25, 2013

    आदरणीय अमन जी, बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद |

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 12, 2012

उम्दा पंक्तियाँ ..बेह्तरीन अभिव्यक्ति .बहुत अद्भुत अहसास.सुन्दर प्रस्तुति. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये आपको और आपके समस्त पारिवारिक जनो को ! मंगलमय हो आपको दीपो का त्यौहार जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

अजय यादव के द्वारा
October 10, 2012

आदरणीय .भीष्म बाला जी, सादर प्रणाम | सुंदर भाव …बहुत ही सुंदर कविता |इस दुनिया में law of attraction के लिए और कोई हैं ही नही हमारे शिवा |जब भी हम किसी को कुछ भी देते हैं ..प्रेम,स्नेह,घृणा ,उत्साह ,उपकार …….तो कहीं ना कहीं उससे ज्यादा खुद को देते हैं …|और जब तक खुद से प्रेम नही होंगा तब तक दूसरों को भला कोई कैसे प्रेम कर सकता हैं -http://avchetnmn.jagranjunction.com/

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 11, 2012

    आदरणीय अजय जी, कविता कि सराहना केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद |

ANAND PRAVIN के द्वारा
October 9, 2012

आदरणीय धवालिमा जी, सादर प्रणाम आपकी चाहत बहुत ही प्रबल है शब्दों में ……..बहुत ही सुन्दर और सुरीली कविता लिखी है आपने प्रथम बार आपके ब्लॉग पर आया कुछ अच्छी चीज पढने को मिली……..आप यूँही लिखते रहे

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 11, 2012

    आदरणीय आनंद जी, बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद |

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 9, 2012

इसीलिए मैं कविता बनकर तेरे होंठों पे आना चाहती हूँ |… शीर्षक चुनना हो तो कोई आप से सीखे …..जय श्री राधे आदरणीया भीष्म बाला जी खूबसूरत सुन्दर भाव प्रवाह …सुन्दर चाह और प्यारी कल्पना अच्छे शब्द ….काश ऐसा ही हो सब अच्छा हो मंगलमय हो तो आनंद और आये ….. सहनशीलता के दीपक में कुंदन-सा मुखमंडल लेकर बाती बनकर अँधियारे को रोशन करना चाहती हूँ |…………..सुन्दर

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 11, 2012

    आदरणीय सुरेन्द जी, कविता कि सराहना, प्रोत्साहन और पसंदगी केलिए बहुत -बहुत धन्यवाद |

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 9, 2012

बहुत सुन्दर भाव एवं प्रस्तुति, बधाई.

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 11, 2012

    आदरणीय प्रदीप सर जी, कविता कि सराहना केलिए हार्दिक धन्यवाद |

sudhajaiswal के द्वारा
October 7, 2012

धवालिमा जी, सबसे पहले तो ये कहना चाहती हूँ कि आपको देखकर मुझे मेरी दोस्त अर्चना गिरी कि याद आ गयी आप बिलकुल उसके जैसी दिखती हैं | आपकी सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई | http://sudhajaiswal.jagranjunction.com.

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय सुधा मैम जी,कविता की सराहना केलिए हार्दिक धन्यवाद |

shashibhushan1959 के द्वारा
October 7, 2012

आदरणीया धवालिमा भीष्मबाला जी, सादर ! “न गैरों से, न अपनों से कोई शिकवा-शिकायत है, मैं अपनी वेदना साकार करना चाहती हूँ ! हृदय की भावना शब्दों में ढल, उतरी है पन्नों पर, स्वयम के भाग्य को आकार देना चाहती हूँ !” बहुत सुन्दर जज्बात ! “इसीलिए मैं कविता बनकर तेरे होंठों पे आना चाहती हूँ |” अंतर्मन की सच्ची भावनाओं का चित्रण ! बेहद भावपूर्ण !

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 7, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, मेरे इस हृदय की भावना भरी कविता की सराहना केलिए हार्दिक धन्यवाद |

chaatak के द्वारा
October 6, 2012

एक बेहतरीन रचना के लेखन पर आपको हार्दिक बधाई!

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 6, 2012

    chaatak ji, बहुत-बहुत धन्यवाद |

jai... के द्वारा
October 6, 2012

बहुत सुन्दर ..

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 6, 2012

    जय जी,बहुत-बहुत धन्यवाद |

yamunapathak के द्वारा
October 5, 2012

अत्युतम भावाभिव्यक्ति है. चहार दीवारी में महफूज़ ……महफ़िल में…हूँ. इस stanza के भाव मुझे बहुत ही आकर्षक लगे. साभार

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 6, 2012

    आदरणीय यमुना मैम जी, कविता के भावों की पसंदगी केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद |

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
October 4, 2012

बहुत ही मनमोहक भाव बधाई ………तस्वीर ये मेरे चेहरे की कभी तो मानो ढल सकती है पर इन वेदनाओं की छोटी इच्छा पूर्ण कभी ना हो सकती है मुझे पढ़ कर अपने नयन से मन तृप्त मेरा तू कर देना इसीलिए मैं कविता बनकर तेरे होंठों पे आना चाहती

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय अनुराग सर जी, बहुत -बहुत धन्यवाद |

manoranjanthakur के द्वारा
October 4, 2012

आ तुझे गुनगुनाना लू … बहुत सुंदर भाव … मंच पर स्वागत .. बधाई

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 6, 2012

    manoranjan sir, बहुत-बहुत धन्यवाद |

ashishgonda के द्वारा
October 4, 2012

आदरणीया! सादर…… “सरस्वती की मूरत बन कर और हाथों में वीणा लेकर ज्ञान स्वरूपा विद्या को अपने भीतर लाना चाहती हूँ सुर की नदिया में बहकर कठोर शब्द की वाणी तोड़ प्रेम-भाव के तारों को गढ़ मधुर संगीत बनाना चाहती हूँ |” बहुत सुन्दर कविता और आपके प्रस्तुति के ढंग की तो सराहना के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. उसे सुन्दर चित्रों से सजाकर और भी मनमोहक बना दिया.

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 5, 2012

    आशीष जी, प्रोत्साहन और सराहना केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद |

Mohinder Kumar के द्वारा
October 4, 2012

ध्वलिमा जी, सुन्दर भाव भरी कविता के लिये बधाई. इसे पढ कर एक गजल याद आ गई ” अपने होंठों पर सजाना चाहता हूं आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूं तेरे दामन पर गिरा कर एक आंसूं बूंद को मोती बनाना चाहता हूं ” लिखती रहिये.

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 5, 2012

    mohinder sir, बहुत-बहुत धन्यवाद |

nishamittal के द्वारा
October 4, 2012

आपकी सुन्दर भावपूर्ण रचना पढ़कर बहुत अच्छा लगा.मंच पर स्वागत एक अच्छी कवियत्री का

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 4, 2012

    आदरणीय निशा मैम जी, कविता की सराहना केलिए बहुत-बहुत धन्यवाद |

jlsingh के द्वारा
October 4, 2012

आदरणीया धवालिमा भीष्मबाला जी, सादर अभिवादन! बहुत सुन्दर भाव युक्त कविता पढ़कर मन प्रफुल्लित हो गया … चाहे यह कविता जिन्हें भी समर्पित हो, वे इसे पढ़कर अवश्य ही खुश होंगे! सादर बधाई!

    Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
    October 5, 2012

    jlsingh sir, ye kavita mere apne bhawon ki kavita hain,aur agar ye kisi ko samarpit hain to har pathak keliye samarpit hain,jaisa ki maine likha bhi hai ki… मुझे पढ़ कर अपने नयन से मन तृप्त मेरा तू कर देना इसीलिए मैं कविता बनकर तेरे होठों पे आना चाहती हूँ |


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